सावन के सोमार …. साँझ के बेरा आ टिप-टिप बरखा. हॉस्टल के सब लइका सिनेमा देखे गइल रहलन स. एगो हमहीं बाँच गइल रहनीं. सोचनी कि आज डट के पढ़ाई करब, बाकिर ओकनी के गइला का बाद, का जाने काहे हमार मन कइसन-कइसन दो होखे लागल. भीतर बहुत अशान्ति बुझाइल त बिड़ला मन्दिर चल देहनी, उहाँ पहुँचनी त देखनी कि मन्दिर लइकियन आ मेहरारूअन से खचाखच भरल बा. हमरा ई ना बुझात रहे कि आज मेहरारूअन के अतना भीड़ काहे बा? तलहीं हमार नजर हरियर साड़ी पेन्हले आ हरियरे बिन्दी लगवले, …. गजब के चुम्बकीय आकर्षण वाली एगो दिव्यांगना पर गइल. … आरे ई त शबाना हई. माने कि हमार श्वेता. ऊ मन्दिर से पूजा क के निकलत रहलीं.

हम धीरे से उनका पीछा हो गइली आ पीछे पीछे चले लगनी, ऊ बहरा पानी के झरना के पास के घास के मैदान पर बइठ के अपना सखियन के इन्तजार करे लगली. हम नजर बचा के धीरे से उनका पीछा बइठ गइलीं आ फेर अपना दूनो हथेली से उनकर आँख मूद देलीं. छन भर खातिर ऊ चिहुँकली आ फेर बोले लगली – “ए सखी छोड़ऽ ना … ए गीता छोड़ऽ, ए सावित्री देखऽ ठीक ना होई …. तू बड़ी तंग करेलू ..अब लड़ाई हो जाई.”

“हो ना जाव लड़ाई, ए सखी! शुरू करऽ वार …” बोलत हम आपन हाथ हटा लेहनी. ऊ हमरा के देख के अवाक रह गइली. लाजे नजर झुक गइल. धीरे से होठ काटत बोलली – “धत छलिया कहीं का.” आ फेर प्यार के बतकही शुरू हो गइल. सखी लोग उनका के हमरा संगे देख के टरक गइल.

ऊ बोलली, हम सखी लोग का साथे सोमारी करे आइल रहनी हँ. हमार माथा ठनकल … शबाना आ सोमारी. हम कहलीं – सोमारी त हिन्दू लोग में होला. उनकर चेहरा तन गइल आ आँख हमरा आँख पर गड़ गइल. ऊ बोलली, प्यार करे वाला ना हिन्दू होला ना मुसलमान. आ दोसर बात ई तू काहे भुला जालऽ कि अगर हमार जनम देबे वाला माई हमरा के शबनम कह के बोलावेले त जिनिगी देबे वाला एगो दोस्त श्वेता कहके भी बुलावेला. हम मने मन कहनी, श्वेता! हमरा प्रति तोहार जे भाव बा, भगवान हमरा के ओह लायक बनावस.

अन्हार बढ़े लागल. हम बोलनी , श्वेता, घरे चलऽ, अन्हार बढ़ल जाता. थोड़े देर ऊ चुप रहली. आस-पास नजर दउड़वली आ फेर हमरा आँख में आँख डाल के बोलली, अन्हार बढ़ल जाता ओसे का. अँजोर त हमरा साथे बा. श्वेता के जिनिगी के अन्हरिया काटे खातिर राहुल के दिव्य प्रकाश कम नइखे.

तलहीं हमरा कमरा के बिजली गुल हो गइल. हमार ध्यान टूटल. हम वर्तमान में वापस लवट अइलीं, मन पागल लेखान हो गइल. अनायासे कादो कादो बके लागल. …हँ …हँ श्वेता …. बिल्कुल ठीक…. राहुल के दिव्य प्रकाश … देखऽ, अन्हार हो गइल. चिराग तरे अन्धेरा …. आग लागल बा, हमरा देह में …. हम धधकत बानी … ओही से प्रकाश निकलत बा…. दिव्य प्रकाश.

हम उनका से मिले खातिर व्यग्र हो गइलीं. चिट्ठी में ऊ हमरा के होली पर बोलवले रहली. हम समझ गइलीं, ई होली ना ईद पर के बोलावा हऽ. ई कुल्हि हमनी के कोड वर्ड ह.

ईद में हम कानपुर गइबो कइनी बाकी उनका घरे ना गइनी. फोन क के उनका के मोतीझील में बोला लिहनी. जब ऊ अइली त हम पूछनीं, “का हो, हमार बाबूजी त तहरा बाबूजी के लँगोटिया इयार हउवन.” पहिले त उ हँसली आ फेर फफक के रो पड़ली. बोलली – “ना, इ झूठ ह … हमार कल्पना ह. तोहरा कठोर दिल के पिघलावे खातिर …. अइसन कठोर जे पाँच बरिस ले पातियो ना लिखल, ओकरे के झकझोरे खातिर, एह झूठ के सहारा लेके, चिट्ठी के मार्मिक बनवलीं कि एहू से तू आ जा.”

“तब, तू बाजी त मार लिहलू. तोहार योजना त सफल हो गइल. हम हँसत बोलनी. तहरा हरमेशा मजाके लागल रहेला. जिनिगी के कभी गम्भीरत से ना सोचे लऽ”, ऊ रीझ के कहली.

आ हम फेर साचहूँ गम्भीर हो गइलीं. हमरा गम्भीरता के तूड़त ऊ बोलली – “खिसिया गइलऽ का. हम त अइसहीं कहलीं हँ.” हम कुछुओ ना बोलनी त ऊ फेर बोलली – “घरे ना चलबऽ ?”

“सरफराज खाँ बनिके कि राहुल बनिके” – हमरा मुँह से अनायासे निकल गइल. ऊ कुछ ना बोलली, चुप. ऊहो चुप, हमहूँ चुप. … चुप्पी…. सन्नाटा साँय-साँय जइसे हवा बहत बहत-बहत रुक गइल होखे. कवनो पतई हिलत ना रहे.

हमहीं पहल क के चुप्पी तुड़नी – “काहे हो ?”

ऊ भरि-भरि आँखि लोर लेले बोलली – “राहुल, दुनिया में बहुते अइसन अद्भुत आ आकर्षक चीज बा, जवना के निर्माण खाली देखे खातिर भइल बा, ओकरा के अपनावल नइखे जा सकत. हर “प्रिय” आपन ना हो पावे आ जे आपन ना हो पावे आ प्रिय होखे …ऊ “पूज्य” हो जाला….उहे ललक हमरा के विवश कइलस चिट्ठी लिखे खातिर – अइसन चिट्ठी जवन तोहरा के विवश कइलस इहवां आवे खातिर. ….आखिर हमार साध पूरा हो गइल. तोहार दर्शन हो गइल. हमरा ओरि देखऽ हम तोहरा के जी भरके देखे के चाहत बानी.

जवना चीज के अपनावल नइखे जा सकत, ओकरा के जी भर के देखहीं के पड़ेला. …. हम केकर दोष दीं….ए रूढ़िवादी समाज के …. अपना दुर्भाग्य के … आ कि माई खातिर बेटी के कर्तव्य के… हँ राहुल हँ …हमार माई त कहिये से सरफराज के आपन दामाद मान चुकल बिया. जब ओकरा ई पता चलल रहे कि सरफराज हरमेशा खातिर कानपुर छोड़ देले बाड़न आ उनकर कवनो पता ठेकान हमरा पास नइखे, त ऊ बड़ा दुखी भइल.

“बाकिर उहे माई जब ई जानी कि ओकर दामाद मुसलमान ना.. हिन्दू हउवन त ओकरा प का गुजरी. ऊ हिन्दू के त फूटलो आँखिन ना देख सकेले आ जब से बाबरी मस्जिद ढहल, तब से त आउरो ना. एमें रिश्ता के बात सोचल त…”

“श्वेता, हम तोहार स्थिति समुझत बानी. तू रोअ मत. देखऽ आजु ले हमनी दोस्त बनके रहल बानी आ जिनिगी भर रहब. एमें बियाह के सवाले कहाँ उठत बा. आवऽ हमनी के किरिया खा लेवे के कि दोसरा के होइयो के हमनी का बीच क डोर कबहूँ टूटी ना.” – हम उनका कन्धापर हाथ ध के बोलनी.

ऊ हमरा से लिपटा के सुसुके लगली. उनका दिल के दरद आँख का राहे छलछला के हमरा छाती पर टपकल आ हमरा सीना में लागल आग के ताप से भाप बनके उड़ गइल. … दिल में जोर से एगो तूफान उठल. आग लहोक ले लेलस. बुझाइल जे सामाजिक रूढ़िवादिता के महल जर के राख हो गइल आ हमनीं एक हो गइलीं. तलहीं ओह राख में दू गो परिवार के ढेर लोग के लाश लउकल. हम ठंढा पड़ गइलीं आ पटना वापस लवट अइलीं.

एह तरी मिले जुले के, फोन पर बात करे के आ चिट्ठी लिखे के सिलसिला फेर शुरू हो गइल. बाकिर बीच में जवन बियाह के प्रश्न त्रिशंकु लेखान लटकत रहे, ऊ हरमेशा खातिर खतम हो गइल रहे. हम ऐ प्रश्न से मुक्त हो गइल रहनी. बाकिर भइया के चिट्ठी पढ़ के हम भावुक ना भइनीं, बलुक पहिले से ज्यादा कठोर बन गइनी.

जिनिगी के दुख-सुख के थपेड़न के सहे खातिर कठोर त बनहीं के पड़ी. यथार्थ कठोर बा, धरती कठोर बिया, त दिल के कठोर त बनावहीं के पड़ी, ना त भावुक बनि के एह कठोर जिनिगी के सफर कव घरी तय कइल जा सकेला ?

त ठीक बा. हम भइया के चिट्ठी के जवाब लिख देब कि भइया हमरा अटैची के चिट्ठी, जवन भउजी के मिलल, उ हकीकत ना ह … एगो कहानी के प्लॉट हऽ.

बोलत बोलत राहुल के गला रूँध गइल. उनकर आवाज बन्द होखे लागल. नाड़ी के गति धीरे-धीरे शून्य का ओर बढ़े लागल. फेर निष्प्राण होके केने दो लापता हो गइल.

आरे, ई पलक झपकते का हो गइल ? इहाँ त केहू नइखे. फेर हम बतियावत केकरा से रहनी हँ ? …भूत से …देवाल से… ना-ना .. फेर केकरा से ? कहीं अपनहीं से त ना ? तब ई राहुल के हऽ ? आ हमहीं के हईं ? हमार दिमाग चक्कर काटे लागल. धरती आकाश सब घूमे लागल. बुझाइल जे राहुल केहू दोसर ना, हमरे आत्मा के दोसर नाम हऽ. हमरे छाया, हमरे प्राण के प्रतिरूप…. जे हमरा बीतला जिनिगी के व्यथा कथा सुनावत बा. हम ध्यान से सुने लगनी. आत्मा के धड़कन. धड़कन के स्वर. एकदम रोआइन. … फेर ठठा के हँसे आवाज, आ ओह हँसी में कुछ व्यंग भरल प्रश्न. बुझाइल जइसे केहू पूछत होखे, का हो मनोज कहानी के प्लॉट ह कि हकीकत के पोस्टमार्टम ?