ई कहानी कुमार मुकेश द्वारा भोजपुरी में लिखल गइल बा. कहानी के पहिला भाग पढ़ल जाव..

प्यार के कहाँ केहू कवनो छंद में बांध पवलें बा,न जात पात,न ऊंच नीच, प्यार त बस प्यार होला. मन के कवनो कोना में जब केहू के अरमान के दिया जरे शुरू हो जाला,जब केहू के सीरत मन में बस जाव आ केतनो निकलला पर भी ना निकले तब समझ लेवे के चाहीं कि प्यार गहरा गइल बा. प्यार त प्यार होला, कबो प्रेमी प्रेमिका होलें प्यार में त कबो कबो मंजिल अकेले भी तय करे के पड़ेला.

ताली के गड़गड़ाहट से धियान टूट गइल. काहें से कि नाटक पर से पर्दा गिर गइल. लेकिन धियान टूट के भी कहीं मानो अटकल रहे, कहीं अझुराइल रहे मन.

मन बेचैन होत रहे,लागल कि नाटक ना बल्कि जीवन पर पर्दा डाल देले होखे. ‘तू हमार कबो रहबे ना कइला कुमार, हम तोहरा से बस बतियावत रहीं आ हमरा ना पता रहे कि तू एह के ई नाम दे देब, हम के भूला जा’ , ‘हमके भूला जा…….!…!…’

आवाज मन के पर्दा पर गूंजे लागल ,बुझाव कि जान निकल जाइ. अपना सीट से उठ के बैग से बोतल निकाल लिहनीं आ जबले खाली ना भइल बोतल तब तक सिर पर गिरावत रही गइनी. सिर ठंडा हो गइल लेकिन ई नाटक दिल आ दिमाग दूनो के हिला दिहलसि.

मानो अबही काल्हु के ही त बात बा. जब नया नया रिश्तेदारी जुड़ेला त लोग रिश्ता निभावे के खातिर धधा जाला. शादी खातिर जब रिश्ता आइल तब केहू माना न कर पावल आ दिन बारी रखा गइल.

भइया के शादी के दिन जून के गर्मी में रखा गइल रहे. सब केहू तइयारी में लागल रहे लेकिन साँच बताई त हमरा ना मालूम रहे कि ई रिश्ता हमार जिंदगी बदल देइ. घर गांव देहात में शादी से पहिले लईका ,लईकी देखला के भी रिवाज होला, मेहरारू भ मरद जाके लईकी देखे ला लोग. जिद कर के हमहूँ चली गइनी, साँच कहीं त भउजी देखे के इच्छा त हमरो रहल.

चांद,सूरज के अँजोरिया नियर निमन भउजी देख के मन गदगद हो गइल,ढेर सारा सपना रहल भउजी के खातिर, भउजी घरे अइहें त हई बात करब, हइसे मजाक करब, लेकिन ओहिजा एकहू शब्द ना निकलल हमरा मुह से.

खैर, उ शुभ बेरा आइये गइल, बारात लेके सब कोई उनकरा घरे पहुँचल. चारो ओर जगमग जगमग करत लाइट के बीच ,सबकर चेहरा के मुस्कान देखे लायक रहल. दुआर पूजा के रश्म निभावल जात रहे. हमहूँ सोचनी काहें ना एकबार हमहूँ देखी कि का होत बा?

नज़र कबो दुआर पूजा के तरफ त कबो लोगन के बीच घूमे लागत, गांव के मेहरारु अपना गारी गीत में लागल रहली.

जून के गर्मी के आंच सबका माथे से पसीना निकाल के रख देले रहे लेकिन सूरज के किरिन जब भोरे भोरे घास के पतई पर पड़े ला त केतना निक लागेला आ ओकर सुघराई के वर्णन ना कइल जा सके ओइसन सुघराई रहल, गाल के पास लटकल बार बेरी बेरी उ अंगूरी में नचा के टार देत रहली. आंख के काजर मानो आसमान में बदरी लागल होखे आ बरसे के खातिर तैयार होखे. ओठ जइसे गुलाब के ताजा ताजा पंखुड़ी होखे अइसन रहे.

अचानक उनकरा पर नज़र पड़ल आ दिल पहिले नज़र में उनकर हो गइल, आंख उनकरा चेहरा से हटे के खातिर तइयार ना रहल. अइसन बुझाइल जइसे हमारा भीतर से केहू जान निकाल लेले होखे.

मेहरारुन के साथे मिल के उहो गीत गावत रहली लेकिन मन के भीतर के मन उनकरा हिलत होठ देख समुझे की उ हमरे के बालावत बाड़ी. कल्पना में हम इहो भुला गइनी कि हम सैकड़ो लोगन के भीड़ में खड़ा बानी.

अचानक उ सकपका गइली काहें से कि हमारा नज़र के उनकर नज़र पकड़ लेले रहे. लेकिन उ अचानक हंस दिहली आ उनकर मंद हसी हमरा दिल के भा गइल आ साँच कही त उ दिल मे समा गइल रहली.

अचानक आवाज से हमार धियान टूट गइल , दुआर पूजा खतम हो गइल रहे,सब लोग बरियात के पानी पियावे ले जात रहे. अचानक नज़र आगे गइल त उ नज़र ना देख मन बेचैन हो गइल आ नज़र उनकरे के खोजे लागल.

सगरो मेहरारु घेरा बना के चुमावन करत रहली. दुआर पूजा के बाद मेहरारू लईकी दूल्हा के चुमावन करेली. सायद एहिजा उ मिल जाव एहि सोच के साथ तनिक हमहू आगे बढ़ के देखे लगनी. मेहरारू कुल मजाक करत चुमावन करत रहली लेकिन उनकर दर्शन ना भइल.

सोचनी कि अब एहिजा से चलल जाव आ लेकिन नज़र सामने से आवत चेहरा पर पड़ल त दिल के आंगन में रात के अन्हरिया में अंजोर हो गइल. मन के मोर नाचे लागल.

बलखात कमर मानो आसमान के चमकत बिजुरी आज कही जगह गिरी आ बिजुरी से कई लोग घाही हो जाई. उनकर चाल में एग अजबे नशा रहल.

अचानक उनकर आवाज से धियान टूट गइल आ हम आपन मोबाइल के कैमरा बंद कर के ओहिजा से चल दिहनि. कब उ चुमावन शुरू कइली आ कब हम मोबाइल कैमरा से उनकर तसवीर लेबे शुरु कइनी पता ही ना चलल. उ कैमरा देख हड़बड़ा गइली आ हमरी तरफ इशारा कर के कुछ कहली आ हम हड़बड़ा के उहाँ से निकल गइनी.

मन अझुरा गइल रहे,दिल पर हाथ रखले बिना पता चल गइल कि दिल धड़क रहल बा. दिल पर आपन जोर ना रहे.

कुमार…ए कुमार.., केहू एतना तेज झकझोर दिहल कि सब ख्वाब,बियाह,मंडप सब हट गइल. दोस्तन के साथे नाटक देखे आइल रहनी आ अपना अतीत के पन्ना पलटे शुरू कर देले रहनी. लेकिन हमरे दोस्त हमके सोच में देख झकझोर के जगा दिहलसि.

कुमार.., कहां भूला गइला हो!, नाटक खत्म हो गइल, घरे ना जइब का? भउजी जोहत होइहें. हं…, हड़बड़ाहट में आवाज ना निकलल, हम अपना दोस्त के साथे घरे चल दिहनी.

लेकिन मन नाटक आ हकीकत में अबहुनो फरक ना क पावत रहे. अबहुनो इहे आवाज गुंजत रहे ‘तू हमार कबो रहबे ना कइला कुमार, हम तोहरा से बस बतियावत रहीं आ हमरा ना पता रहे कि तू एह के ई नाम दे देब, हम के भूला जा’ , ‘हमके भूला जा…….!…!…’

कहानी जारी रही दुसरका भाग में….